शीत युद्ध क्या है? शीत युद्ध कब हुआ था इस के कारण और परिणाम

आज हम ऐसे टॉपिक को बताने जा रहे हैं जो सोशल साइंस से संबंधित है और इसकी जानकारी विद्यार्थियों को रखना आवश्यक है. आज हम अपने इस आर्टिकल के माध्यम से आपको बताएंगे कि शीत युद्ध क्या है?

द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात एक ऐसे युद्ध की स्थिति सामने आई जिसमें 2 देशों के द्वारा बिना हथियारों का युद्ध चल रहा था जिसमें दोनों देश अखबारों और सोशल मीडिया के माध्यम से कूट नीतियों को अपनाते हुए एक-दूसरे देश की निंदा करते थे इसी क्रियाकलापों के दौरान शीत युद्ध का छवि सामने आया.

Cold war (शीत युद्ध) क्या है ? 

शीत युद्ध एक प्रकार की मस्तिष्क रूप से लड़ी जाने वाली युद्ध है अर्थात शीत युद्ध को 2 देशों के द्वारा हथियार के बजाए विचारों के माध्यम से लडी गई थी. शीत युद्ध 1945 से 1991 ईस्वी तक अमेरिका और रूस के बीच चला था.

द्वितीय विश्व युद्ध होने के बाद अमेरिका और रूस के मध्य जिस युद्ध की स्थिति सामने आई थी उसी युद्ध को शीत युद्ध कहा जाता है जिसके अंतर्गत वे दोनों देश अखबारों और सोशल मीडिया के द्वारा एक दूसरे देशों की निंदा करते हुए इस युद्ध की लड़ाई की थी जिसमें किसी भी प्रकार की हथियारों का योगदान नहीं था.

एक देश अपने विपक्षी देश के प्रति अखबारों में अनेक प्रकार की टिप्पणियां लिखवाकर उस देश की निंदा करते है. शीत युद्ध  कूटनीतियों के माध्यम से लड़ा जाने वाला युद्ध है जिसमें किसी भी प्रकार की हथियारों तलवार, बंदूक इत्यादि का इस्तेमाल ना करते हुए विपक्षी देश के लिए कूट नीतियों को बनाकर और उनकी कमियों को अखबारों में छाप कर इस युद्ध को लड़ा जा रहा था.

पंडित जवाहरलाल नेहरु के द्वारा शीत युद्ध को ऐसा युद्ध कहा गया है जो दिमाग के द्वारा लड़ा जाता है जिसमें शत्रुओं को कूट नीतियों के माध्यम से अकेला कर मित्रों को जिताना होता है.

वहीं दूसरी और डॉक्टर फ्लेमिंग महोदय ने इस युद्ध को ऐसे युद्ध कहां है जिसे फिल्ड में नहीं बल्कि मस्तिष्क के माध्यम से लड़ा जाता है.

शीत युद्ध के उत्पत्ति का कारण

शीत युद्ध की उत्पत्ति द्वितीय विश्व युद्ध के द्वारा हुई थी, जब द्वितीय विश्व युद्ध का दौर चल रहा था उस समय अमेरिका ने अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करते हुए जापान देश को परमाणु से अटैक किया था,परमाणु के इस अटैक ने रूस के राष्ट्रपति को अपने आप में असुरक्षा महसूस करवाया. 

रूस के राष्ट्रपति जिनका नाम स्टेलिन था उन्हें लगा कि अमेरिका उनसे इस शक्ति का प्रदर्शन इसलिए छुपाया ताकि वे भविष्य में साम्यवाद को समाप्त कर सकें इस प्रकार शीत युद्ध का प्रथम चरण शुरू हुआ था. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो रूस को अकेला और असुरक्षा महसूस होना ही इस युद्ध का मुख्य रीजन है.

इस प्रकार से शीत युद्ध का और भी ऐसे कई कारण हैं जिनके वजह से शीत युद्ध की उत्पत्ति हुई थी:-

फुलटन घोषणा:-

जब 5 मार्च 1946 ईस्वी में फुलटन की घोषणा की गई तब रूस को अत्यधिक परेशानी महसूस होने लगा और इसी घोषणा के कारण शीत युद्ध की शुरुआत हुई.

टर्की पर रूस का दबाव:- 

जब  टर्की देश में रूस अपनी शक्तियों से दबाव डालने लगा उस समय अमेरिका देश ने यह ऐलान किया कि टर्की पर किसी भी प्रकार का दबाव यदि कोई करें तो उस देश को हमारी शक्तियों से मुकाबला करना होगा अर्थात इसके बदले उस देश पर कार्रवाई की जाएगी.

अमेरिका के इस धमकी वाले बात को सुन रूस के राष्ट्रपति को तनाव के साथ-साथ क्रोध भी आया और इस कारण से शीत युद्ध का प्रारंभ हुआ.

रूस द्वारा शांति व्यवस्था में बाधा:-

जब रूस देश चारों ओर से तनाव से भर रहा था उस समय इस देश के द्वारा शांति व्यवस्था में अनेक प्रकार से बाधाएं डाली जाने लगी. और इन सभी बाधाओं से शांति व्यवस्था को बनाए रखना बहुत ही मुश्किल हो गया, यह भी शीत युद्ध  आरंभ  होने  का कारण था.

साम्यवादी क्रांति का प्रभाव:-

साम्यवाद एक विश्वव्यापी आंदोलन  माना जाता था इसलिए पश्चिमी राष्ट्रीय सोवियत संघ को समाप्त करने का प्रयास 1917 के बोलशेविक क्रांति से किया जा रहा था.

युद्ध काल में रूस को पर्याप्त सहायता:-

विश्व युद्ध के दौरान जब जर्मनी के द्वारा रूस देश पर आक्रमण की जा रही थी उस समय पश्चिमी देशों के द्वारा भेजे गए सैनिक की संख्या बहुत ही कम थी इसलिए रूस ने आरोप लगाई कि रूस देश को युद्ध के दौरान बहुत ही अल्प संख्या में सैनिकों को भेजा गया था.

अमेरिका में रूसी प्रचार:-

जहां अमेरिका पूंजीवादी विचारधारा को समर्थन करता था वहीं रूस ने अमेरिका में अपना साम्यवादी प्रचार करना शुरू कर दिया था. इसलिए अमेरिका इसके विरुद्ध था.

अमेरिका विरोधी प्रचार:-

रूस देश ने अपने सोशल मीडिया और समाचार पत्रों में अमेरिका के विरुद्ध टिप्पणियां लिखवाना शुरू कर दिया और रूस के द्वारा इस तरह की आलोचनात्मक विचारों को लिखकर अमेरिका देश को निंदा करने की कोशिश की गई.

रूस के द्वारा जर्मनी पर अत्यधिक भार:-

रूस के द्वारा जर्मनी के उद्योगों को अस्त-व्यस्त कर दिया गया और इसके साथ साथ अधिक मूल्य वाले मशीनों को रूस अपने देश में ले आया जिससे जर्मनी देश की अर्थव्यवस्था पर ज्यादा प्रभाव पड़ा.

शीत युद्ध का परिणाम:-

शीत युद्ध होने से विश्व में दो गुटों को बनाया गया जो “नाटो” और “वारसा” है. नाटो अमेरिका का गुट है और वारसा  रूस का गुट है. 

इन दोनों गुटों का निर्माण से विश्व को अत्यधिक समस्याओं का सामना करना पड़ा क्योंकि यह दोनों गुट विश्व को अपने-अपने गुटों में शामिल करना चाह रहे थे और इसके प्रयास में वे दोनों जुटे हुए थे. 

जब इन दोनों गुटों का सिलसिला चल रहा था उस समय एक गुटनिरपेक्षक नाम का एक पृथक तैयार किया गया जिसमें हमारा देश भारत भी उस गुट के अंतर्गत आता है.

शीत युद्ध के दौरान बर्लिन की दीवार गिर गई और दो जर्मनी एक हो गए वहीं दूसरी और यूरोप की राजनीति में साम्यवादी कट्टरपंथी धीरे-धीरे कम होती चली गई. और इन सभी के साथ साथ अमेरिका और रूस ने एक नए युग का शुरुआत किया.

भारत और शीत युद्ध:-

शीत युद्ध की हानि से बचने के लिए भारत का यह प्रयास रहा कि वह जहां तक संभव हुआ इस शीत युद्ध से यह देश दूरी बना कर रहा. इसके साथ-साथ भारत किसी भी गुटों का समर्थन नहीं करना चाहता था अर्थात भारत देश ना ही अमेरिका के गाटो गुट का समर्थन करना चाहता था और ना ही रूस के वारसा गुट का.

क्योंकि भारत हमेशा इस युद्ध से बचने की कोशिश की ताकि भारत देश में किसी भी प्रकार की समस्याएं उत्पन्न ना हो. इसलिए भारत देश के द्वारा एक पृथक गुट को बनाया गया जो गुटनिरपेक्ष के नाम से जाना जाता है.

इस गुटनिरपेक्ष में वह देश सम्मिलित हैं जो उन दोनों गुटों में शामिल नहीं होना चाहये थे अर्थात शीत युद्ध में जो देश हस्तक्षेप नहीं करना चाहते थे वह गुटनिरपेक्ष के अंतर्गत शामिल थे. पाकिस्तान भी  भारत के जैसा इस शीत युद्ध से दूर रहना चाहता था इसलिए पाकिस्तान देश भी गुटनिरपेक्ष में शामिल था.

भारत देश अपने आप को जहां तक संभव हुआ इस युद्ध से दूर रखने का प्रयास किया और काफी हद तक इस युद्ध से दूर रहने में यह सफल भी हुए क्योंकि भारत देश उन गुटों में सम्मिलित ना होने के बजाय गुटनिरपेक्ष में शामिल थे.

इस प्रकार भारत देश अपने देश के साथ-साथ अपने देश की सारी जनता को भी इस शीत युद्ध से सुरक्षित रखा जिससे किसी भी प्रकार की समस्याएं हमारे भारत देश में इस युद्ध के कारण नहीं हुइ.

शीत युद्ध की समाप्ति कब हुई:-

रूस के राष्ट्रपति अमेरिका देश के साथ अपने राष्ट्रीय नीति को एक अलग नए तरीके से प्रस्तुत किया और इन सभी प्रक्रियाओं के दौरान इन दोनों देशों में मन मिलाप हो गया और मन मिलाप होने के साथ-साथ इन दोनों देशों में मित्रता भी हो गई जिससे शीत युद्ध की समाप्ति हुई. अंतत: इस शीत युद्ध की समाप्ति 1991 ईसवी में रूस के विघटन से हुई.

शीत युद्ध की समाप्ति का कारण क्या है?

शीत युद्ध की समाप्ति का कारण अनेक है जो निम्नलिखित है:-

जनमत का महत्व:-

युद्ध कोई भी हो, युद्ध होने से हमेशा जनता को विभिन्न प्रकार की समस्याओं को झेलना पड़ता है, अनेक प्रकार की दूविधाओं को पास करना होता है, युद्ध हमेशा सभी जनता के लिए एक बोझ की तरह होता है जिसमें किसी को कुछ हासिल नहीं होता बल्कि जनता को अनेक प्रकार के नुकसान का सामना करना पड़ता है.

इन सभी कारणों के कारण जनता हमेशा युद्ध के विरुद्ध ही रहती है ताकि उन्हें किसी प्रकार की समस्याओं का सामना ना करना पड़े.

अमेरिका अकेला महाशक्ति:-

शीत युद्ध के समाप्त होने के कारण रूस देश का विघटन है, रूस देश का विघटन होना विश्व में एक नया बदलाव लाया जिससे शीत युद्ध समाप्त हुआ और विश्व में अमेरिका एकमात्र देश बचा जो सबसे शक्तिशाली था.

यूरोप में बदलाव:-

यूरोप में राजनीतिक विचारों में बदलाव आना  भी शीत युद्ध की समाप्ति का कारण है. यूरोप में और भी बदलाव आए जैसे जर्मनी में दीवार का टूटना, पोलैंड में राजनीतिक कट्टरपंथी की स्थिति में गिरावट आना.

तटस्थता की राजनीति:-

 फ्रांस अमेरिका के गुट जिनका नाम नाटो था इसमें ज्यादा खर्च नहीं करना चाहता था और अधिकतर मामलों में फ्रांस तटस्थता के अंतर्गत था.

असंलंगता का प्रभाव शीट:-

द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद नासिर नेहरू जी का विचार यह था की विश्व को इस शीत युद्ध से दूर रखा जाए अर्थात शीत युद्ध से विश्व को बचाया जाए.

ऊपर बताए गए तथ्यों से शीत युद्ध की समाप्ति का कारण अस्पष्ट होता है.

शीत युद्ध की विशेषताएं:-

शीत युद्ध के विभिन्न विशेषताएं:-

शीत युद्ध को मस्तिक से लड़ने वाला युद्ध कहा जाता है अर्थात कूट नीतियों के द्वारा यह युद्ध लड़ी जाती थी जिसमें हथियारों का इस्तेमाल नहीं होता बल्कि विपक्षी देशों के प्रति कूट नीतियां अपनाकर वाक्यों के अनुसार इस युद्ध को लड़ा जाता है जैसे अखबारों या न्यूज़ चैनल में दुश्मन देश  के विरुद्ध टिप्पणियां लिखवाना. इन सभी वाक्यों से लड़ाई करते वक्त युद्ध की स्थिति सामने तो आती थी लेकिन युद्ध होता नहीं था.

दोनों महा देशों की शक्तियों के बीच एक तनाव की स्थिति उत्पन्न हुई थी जिसे शीतयुद्ध कहा जाता है. शीत युद्ध को, वार्तालाप करते हुए लड़ा जाने वाला युद्ध भी कहा जाता है जिसमें बिना हथियारों की लड़ाई होती है.

शीत ऋतु अमेरिका और रूस देशों के बीच होने वाले संघर्ष को कहा जाता है जिसमें दोनों देशों के द्वारा विचारों के माध्यम से इस युद्ध को लड़ा गया था.

शीत युद्ध के दौरान जब अपने विचारों को प्रकट करते हुए विपक्षी देशों के विरुद्ध बातें बोलकर लड़ा जाता था  तो उस वार्तालाप की लड़ाई में कभी-कभी युद्ध होने का चांस भी बनता था जिसमें दोनों देशों में सैनिकों को मजबूत करने का अवसर भी मिलता था हालांकि यह युद्ध होता नहीं था लेकिन जब इसकी संभावना होती थी तो दोनों देशों के द्वारा अपने सैनिकों को मजबूत किया जाता था.

शीत युद्ध का  आरंभ 1945 में हुई और 1991 ईस्वी में इस युद्ध को अमेरिका ने जीता और यह शीत युद्ध समाप्त की गई.

निष्कर्ष

शीत युद्ध अमेरिका और रूस के बीच में वार्तालाप के अनुसार होने वाला युद्ध था जिसे इन देशों ने बिना हथियार का इस्तेमाल किए लड़ा. इस युद्ध की जानकारी विद्यार्थियों को होना बहुत ही जरूरी है क्योंकि सोशल साइंस से संबंधित प्रश्नों के अंतर्गत इस युद्ध से संबंधित प्रश्न एग्जाम में आते हैं. 

आज आपने हमारे इस आर्टिकल के माध्यम से जाना कि शीत युद्ध क्या है? उम्मीद है आपको हमारा यह आर्टिकल अच्छा लगा हो और   हमारे इस आर्टिकल के माध्यम से शीत युद्ध के बारे में सारी जानकारी मिली हो.

Wasim Akram

वसीम अकरम WTeckni के मुख्य लेखक और संस्थापक हैं. इन्होंने इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की है लेकिन इन्हें ब्लॉगिंग और कैरियर एवं जॉब से जुड़े लेख लिखना काफी पसंद है.

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